हमारे देश में वैसे तो हर कोने में कला है-चाहे वह चलती बस में खिड़की के पास वाली सीट हथियाने की कला हो या फिर ट्रैफिक जाम में भी रास्ता ढूंढ निकालने की वास्तुकला। लेकिन इस बार पेरिस वालों (प्रिक्स वर्साय) ने हमारी इस रचनात्मकता को कुछ ज़्यादा ही गंभीरता से ले लिया। उन्होंने साल 2026 के दुनिया के सबसे खूबसूरत एयरपोर्ट्स की लिस्ट जारी की, और उसमें भारत के एक नहीं, बल्कि दो-दो एयरपोर्ट्स का नाम शामिल कर दिया!
पेरिस के जजों ने जब 'नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट' और गुवाहाटी के 'लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई इंटरनेशनल एयरपोर्ट' की तस्वीरें देखीं, तो वे अपनी एफिल टावर वाली कॉफ़ी भूल गए। उन्होंने कहा, "मोन अमि (मेरे दोस्त)! ये इंफ्रास्ट्रक्चर है या कोई कला का म्यूजियम?"
नवी मुंबई: जहाँ फ्लाइट छूटे तो छूटे, रील नहीं छूटनी चाहिए!
नवी मुंबई के टर्मिनल-1 को देखकर फ्रांस के डिजाइनर्स सोच में पड़ गए हैं कि भारतीय लोग सीधे एयरपोर्ट जाते हैं या पहले किसी योग शिविर से होकर आते हैं? क्योंकि इसका डिजाइन 'कमल के फूल' से प्रेरित है। अब सोचिए, जिस देश में लोग घर के सोफे पर बैठकर भी 'लूटस पोज' (पद्मासन) में आ जाते हैं, वहाँ जब वे कमल की पंखुड़ियों जैसी विशाल छत के नीचे खड़े होकर बोर्डिंग पास लेंगे, तो शांति का अनुभव तो होना ही है।
अंदर की आधुनिक डिजिटल आर्ट और आकर्षक स्तंभों को देखकर अब यात्रियों को यह डर सताने लगा है कि कहीं वे अपनी फ्लाइट पकड़ने के बजाय वहाँ इंस्टाग्राम रील्स और 'एयरपोर्ट लुक' की तस्वीरें खिंचवाने में ही न व्यस्त हो जाएं। सचमुच, वास्तुकला ऐसी हो कि सुरक्षा जांच (Security Check) की लंबी लाइन में खड़ा आदमी भी कहे-"चलो, भले ही दो घंटे से खड़ा हूँ, पर खड़ा तो कमल की पंखुड़ी के नीचे हूँ!"
गुवाहाटी: 'स्काई फॉरेस्ट' और बांस का वो स्वैग, जो सीधे असम ले जाए
उधर असम के गुवाहाटी (टर्मिनल-2) ने तो कमाल ही कर दिया। उन्होंने 'स्काई फॉरेस्ट' थीम और बांस की आकृतियों से ऐसा माहौल बनाया है कि विदेशी यात्रियों को समझ ही नहीं आ रहा कि वे किसी हवाई अड्डे में घुसे हैं या सीधे काजीरंगा के जंगलों में सैर कर रहे हैं। ब्रह्मपुत्र नदी से प्रेरित इस डिजाइन को देखकर तो कुछ लोग यह भी उम्मीद करने लगे हैं कि काश! रनवे के बगल से ही चाय की चुस्कियां भी मिलने लगें।
विदेशी विशेषज्ञ हैरान हैं कि भारत के लोग बांस और जनजातीय कला से अंतरराष्ट्रीय स्तर का 'सस्टेनेबल' मॉडल कैसे बना लेते हैं। अब उन्हें कौन समझाए कि हमारे यहाँ बांस का इस्तेमाल सिर्फ ढांचा बनाने में नहीं, बल्कि 'अनुशासन' बनाए रखने में भी सदियों से होता आया है!
सात अजूबों में दो हमारे: जर्मनी और अमेरिका भी रह गए पीछे
प्रिक्स वर्साय की इस सूची में चीन का डिजाइन, जर्मनी का फ्रैंकफर्ट और अमेरिका का पिट्सबर्ग भी शामिल हैं। लेकिन दिल पर हाथ रखकर बताइए, क्या जर्मनी के कंक्रीट में वो बात है जो हमारे पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक विरासत में है? अमेरिका वाले चाहे जितना भी 'सैन डिएगो' चिल्ला लें, पर हमारे नवी मुंबई के डिजिटल आर्ट के आगे सब फीका है।
विशेषज्ञ कह रहे हैं कि इस सूची में चयन केवल चमक-दमक देखकर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और पर्यावरण को देखकर हुआ है। खैर, वजह जो भी हो, यह हमारे एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए एक ऐतिहासिक लम्हा है।
अब बस एक ही डर है कि कहीं इस बेहद खूबसूरत और बेहतरीन अंतरराष्ट्रीय डिजाइन को देखकर हमारे कुछ देसी यात्री वहाँ गुटखे की पीक मारकर अपनी 'सांस्कृतिक पहचान' छोड़ने की कोशिश न करें! भारत के इन दो नए रत्नों को बधाई, अब पेरिस वाले भी मान चुके हैं कि सफर सिर्फ उड़ने का नहीं, बल्कि उड़ने से पहले ठहरकर मुस्कुराने का नाम है।



