उत्तर प्रदेश की कैबिनेट ने आखिरकार शेक्सपियर के उस पुराने और घिसे-पिटे जुमले को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने पूछा था कि नाम में क्या रखा है। सरकार ने शाहजहाँपुर के जलालाबाद का नाम बदलकर 'परशुरामपुरी' करने के प्रस्ताव को मंजूरी देकर यह साबित कर दिया कि नाम में सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि पूरा का पूरा गौरव और भरपूर जनभावनाएं रखी होती हैं।
इस फैसले के बाद अब सरकारी दस्तावेजों से लेकर इलाके के साइनबोर्ड्स तक, हर जगह से 'जलाल' का साया हटेगा और भगवान परशुराम के नाम का तेज चमकेगा। वैसे यह उन लोगों के लिए आंखें खोलने वाला फैसला है जो सोचते हैं कि पुनर्जन्म सिर्फ इंसानों का होता है, क्योंकि अब कस्बों और शहरों का भी बाकायदा 'सांस्कृतिक पुनर्जन्म' होने लगा है।
केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद जी की खुशी तो इस फैसले के बाद देखते ही बन रही थी, उन्होंने इसे सनातन परंपरा का ऐसा बड़ा सम्मान बताया मानो नाम बदलते ही शाहजहाँपुर के हर नागरिक को कोई बहुत बड़ा सांस्कृतिक उपहार मिल गया हो। उन्होंने प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक सबका आभार ऐसे जताया जैसे सदियों से तरस रहे इस कस्बे को इसकी असली और ऐतिहासिक पहचान मिल गई हो।
उधर विपक्ष हमेशा की तरह इस सोच में डूबा है कि नाम बदलने से जमीनी व्यवस्थाएं रातों-रात कैसे बदलेंगी, लेकिन उन्हें कौन समझाए कि असली विकास तो आत्मसम्मान का होता है। जब नाम में ही इतना रौब और वजन होगा, तो क्षेत्र की पहचान खुद-ब-खुद बहुत बड़ी और सम्मानजनक हो जाती है।
अब सारा दारोमदार सरकारी बाबुओं पर है, जो आने वाले दिनों में फाइलों और रिकॉर्ड्स से पुराना नाम मिटाने के इस प्रशासनिक काम में जुटेंगे। स्थानीय लोग भी इस बदलाव से बेहद उत्साहित हैं क्योंकि भले ही उन्हें अपने जरूरी दस्तावेजों में सुधार करवाने के लिए आने वाले समय में थोड़ी कागजी प्रक्रिया से गुजरना पड़े, लेकिन कम से कम अब वे सीना चौड़ा करके कह सकेंगे कि वे एक ऐतिहासिक और पावन नगरी के निवासी हैं, जिसके लिए वे लंबे समय से इंतजार कर रहे थे।



