एक समय था जब भारत में बच्चे का जन्म होते ही उसका नाम और रिश्ता लगभग साथ-साथ तय हो जाता था। बच्चा "मम्मा" बोले या न बोले, बुआ जी कह देती थीं—"हमारी सहेली की बेटी है, जोड़ी पक्की समझो।"
लेकिन अब जमाना बदल गया है। हाल ही में 10,340 युवाओं पर हुए एक सर्वे में सामने आया कि 28 वर्ष से अधिक उम्र के 39% सिंगल भारतीय शादी को अब जीवन की अनिवार्यता नहीं, बल्कि एक विकल्प मानते हैं। वहीं हर तीन में से एक युवा का मानना है कि अगले 10 वर्षों में शादी का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा।
आज का युवा पहले नौकरी, प्रमोशन, घर, विदेश यात्रा और मानसिक शांति चाहता है। उसके बाद अगर समय बचा तो शादी पर विचार करता है। पहले मां-बाप पूछते थे, "शादी कब करोगे?" अब बेटा पूछता है, "EMI कौन भरेगा?"
मैट्रिमोनियल विज्ञापन भी बदल गए हैं। पहले "सुशील और संस्कारी" जीवनसाथी चाहिए होता था, अब "इमोशनली अवेलेबल, पेट-लवर और वर्क-फ्रॉम-होम फ्रेंडली" चाहिए।
सबसे ज्यादा संकट तो रिश्तेदारों का है। उनका सदाबहार सवाल "अगला नंबर किसका है?" अब बदलकर "शादी का कोई प्लान है या पनीर टिक्का की उम्मीद छोड़ दें?" हो गया है।
घबराइए मत, भारतीय शादी खत्म नहीं हुई है। बस उसका नया वर्जन आ गया है, जिसमें "I Agree" दबाने से पहले लोग अब Terms & Conditions पढ़ने लगे हैं।



