हेडिंग पढ़कर चौंकिए मत! हमारे देश में अब प्यार करना भी किसी प्रतियोगी परीक्षा से कम नहीं रह गया है। पहले लोग पूछते थे, "लड़का क्या करता है?" अब पहला सवाल होता है—"जन्म प्रमाणपत्र साथ लाए हो या नहीं?"
दो किशोर अगर साथ दिख जाएं, तो समाज का सीसीटीवी सिस्टम तुरंत एक्टिव हो जाता है। पड़ोसी, रिश्तेदार, चाचा, मामा और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ मिलकर ऐसा माहौल बना देते हैं कि प्रेम कहानी सीधे पुलिस स्टेशन पहुंच जाती है। फिर शुरू होता है कानून, कागज और तारीखों का लंबा सफर।
सुप्रीम कोर्ट ने भी अब इस बात पर चिंता जताई है कि कई मामलों में आपसी सहमति वाले किशोर रिश्तों में भी POCSO कानून का इस्तेमाल हो रहा है। यानी मामला दिल का हो, लेकिन एंट्री सीधे कानूनी धाराओं से होती है।
हमारे यहां प्यार से ज्यादा तेज़ी से सिर्फ सलाह मिलती है। "बेटा पहले पढ़ाई कर लो", "करियर बना लो", "मोबाइल छोड़ दो", "उससे बात मत करो"… और अगर इन सबके बावजूद दोनों ने एक-दूसरे से बात कर ली, तो पूरा परिवार ऐसे सक्रिय हो जाता है जैसे किसी राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला हो।
दिलचस्प बात यह है कि किशोरों से कोई खुलकर रिश्तों, जिम्मेदारी या सहमति (Consent) पर बात नहीं करता। लेकिन जैसे ही कोई मामला सामने आता है, हर कोई कानून का विशेषज्ञ बन जाता है।
मजाक अपनी जगह है, लेकिन यह मुद्दा गंभीर है। बच्चों की सुरक्षा के लिए बने कानून बेहद जरूरी हैं और उनका सख्ती से पालन होना चाहिए। साथ ही यह भी जरूरी है कि कानून का इस्तेमाल उसके वास्तविक उद्देश्य के लिए हो। जागरूकता, संवाद और सही मार्गदर्शन कई ऐसे मामलों को जन्म लेने से पहले ही रोक सकते हैं।
आखिरकार, प्यार का इलाज एफआईआर नहीं, बल्कि समझदारी, संवाद और सही शिक्षा है।



