हमारे बुजुर्ग अक्सर कहते थे, "बेटा, पैसा बचाओ, विपत्ति में काम आएगा।" लेकिन धन्य हो हमारी Gen Z (1997-2012 के बीच अवतरित हुए महापुरुष), जिन्होंने इस रूढ़िवादी सोच को हमेशा के लिए बदल दिया है। अब यह पीढ़ी बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि 'एक्सपीरियंस बैलेंस' बना रही है। CBRE की नई रिपोर्ट चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि अब भारतीय युवाओं को महंगे गैजेट्स, कपड़ों या गाड़ी-बंगले जैसी 'नश्वर' भौतिक चीजों से मोहभंग हो चुका है। वे अब सीधे 'परम मोक्ष' यानी यात्रा, होटल और रेस्तरां के अनुभवों पर दिल खोलकर (और कभी-कभी क्रेडिट कार्ड खाली करके) खर्च कर रहे हैं।

आईफोन पुराना हुआ, अब तो 'चेक-इन' का जमाना है!
एक समय था जब युवा नया फोन खरीदने के लिए महीनों प्लानिंग करते थे। लेकिन आज की Gen Z को कोई नया गैजेट दिखाओ, तो उनका रिएक्शन होता है-"यार, इतने में तो मैक्लोडगंज का ट्रिप हो जाएगा!" भौतिक वस्तुएं क्या हैं? आज हैं, कल स्क्रीन टूट जाएगी। लेकिन एक बार जब आप किसी फाइव-स्टार होटल के 'स्मार्ट रूम' में बैठकर वॉयस कमांड से पर्दा हटाते हैं, तो वो अनुभव अजर-अमर हो जाता है। रिपोर्ट कहती है कि 2025 से 2030 के बीच होटलों पर होने वाला खर्च $10.6\%$ की रफ्तार से बढ़ेगा। यानी आने वाले समय में देश की जीडीपी रील्स के 'व्यूज' और होटलों के 'रिव्यूज' से तय होने वाली है!
'लाइफस्टाइल होटल' और सोशल मीडिया का पवित्र गठबंधन
होटल इंडस्ट्री भी अब समझ चुकी है कि Gen Z को सिर्फ एक कमरा, बेड और बाथरूम देकर बहलाया नहीं जा सकता। उन्हें चाहिए 'संपूर्ण अनुभव'। कमरा ऐसा होना चाहिए जिसके बैकग्राउंड की लाइटिंग में चेहरे पर बिना फिल्टर के भी ग्लो आ जाए।
मूलमंत्र: "अगर आपने किसी होटल में ठहरकर उसकी फोटो इंस्टाग्राम पर पोस्ट नहीं की, तो क्या आप सचमुच वहां ठहरे थे?"
यही कारण है कि 'लाइफस्टाइल होटल' की डिमांड रॉकेट की तरह ऊपर जा रही है। जहां लोकल कल्चर की थीम हो, सेल्फ चेक-इन हो (क्योंकि इंसानों से बात करना तो वैसे भी इस पीढ़ी को थोड़ा एंग्जायटी देता है), और वेलनेस सुविधाएं हों, ताकि वीकेंड पर की गई पार्टी का डिटॉक्स मंडे की सुबह तक हो सके।
साल में एक बड़ी छुट्टी? 'नो ब्रो, दैट्स सो ओल्ड स्कूल!'
होटल और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर के अच्छे दिन इसलिए भी आ गए हैं क्योंकि यह पीढ़ी साल में एक बार लंबी छुट्टी पर जाने वाले 'थकाऊ' ढर्रे में विश्वास नहीं रखती। उन्हें चाहिए हर महीने तीन 'माइक्रो-वेकेशंस'। फ्राइडे की शाम को ऑफिस का लैपटॉप बंद हुआ नहीं कि ये लोग अपनी पहचान और जीवनशैली की तलाश में किसी नियरबाय हिल स्टेशन या बुटीक रिज़ॉर्ट के लिए निकल पड़ते हैं।
अर्थव्यवस्था को मिला 'एक्सपीरियंस' का बूस्टर डोज़
सिंगापुर और हांगकांग वाले शायद सोच रहे होंगे कि उनके यहां लाइफस्टाइल होटल ज्यादा हैं, लेकिन उन्हें भारतीय Gen Z की ताकत का अंदाजा नहीं है। यह वो पीढ़ी है जो भले ही 'वर्क फ्रॉम होम' कर रही हो, लेकिन उनका दिल हमेशा 'वर्क फ्रॉम होम-स्टे' में धड़कता है। डेवलपर्स और निवेशक अपनी तिजोरियां खोलकर तैयार बैठे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि जब तक युवाओं के पास स्वाइप करने के लिए कार्ड है और घूमने के लिए 'वांडरलस्ट’ का कीड़ा है, तब तक होटल इंडस्ट्री में मंदी आने का कोई चांस ही नहीं है।
तो साहब, अलमारी में रखे महंगे कपड़ों और दराज में बंद गैजेट्स को भूल जाइए। देश की अर्थव्यवस्था अब 'अनुभवों' के पहिए पर दौड़ रही है। अगली बार जब आप किसी युवा को पहाड़ की चोटी पर बैठकर 'लाइक और शेयर' मांगते देखें, तो समझ जाइएगा कि वह सिर्फ घूम नहीं रहा है, बल्कि देश के हॉस्पिटैलिटी सेक्टर की तस्वीर बदल रहा है!



