बिहार का प्रशासनिक अमला इन दिनों इतनी तेजी से काम कर रहा है कि सरकारी फाइलें भी शायद आपस में पूछ रही होंगी-"भाई, हम सच में सरकारी दफ्तर में हैं या किसी स्टार्टअप के ऑफिस में?" इसका ताजा उदाहरण भोजपुर जिले का बिलौती गांव है, जहां एक एनकाउंटर हुआ और उसके बाद घटनाओं ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि न्यूटन के गति के नियम भी थोड़ी देर के लिए चकरा जाएं।
17 जून को पुलिस और एसटीएफ की संयुक्त कार्रवाई हुई। पुलिस ने कहा-आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी। उधर सोशल मीडिया ने कहा-रुकिए, पहले वीडियो देखिए। देखते ही देखते हर मोबाइल स्क्रीन पर 'जनता की अदालत' लग गई। कोई फोरेंसिक एक्सपर्ट बन गया, कोई कानूनविद और कुछ लोग तो ऐसे आत्मविश्वास से फैसला सुनाने लगे जैसे न्यायपालिका ने उन्हें 'वर्क फ्रॉम होम जज' नियुक्त कर दिया हो।
मजेदार बात यह रही कि इस बार राजनीति ने भी सबको चौंका दिया। आमतौर पर सत्ता और विपक्ष के बीच जितनी दूरी होती है, उतनी दूरी शायद धरती और मंगल ग्रह के बीच भी नहीं होगी। लेकिन इस मामले में दोनों के सुर एक जैसे थे-"जांच होनी चाहिए।" लोकतंत्र में इससे सुंदर दृश्य भला और क्या होगा, जब विरोधी भी एक ही मांग पर सहमत हो जाएं।
सरकार ने भी देर नहीं लगाई। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने न्यायिक जांच की घोषणा कर दी। यानी बिहार में अब सिर्फ घटनाएं नहीं होतीं, उनकी एक्स-रे भी होती है और वह भी रिटायर्ड हाईकोर्ट जज की निगरानी में। यह संदेश साफ है कि जनता के सवालों का जवाब सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं, बल्कि संस्थागत जांच से दिया जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने दो बातें साबित कर दी हैं। पहली, सोशल मीडिया अब सिर्फ डांस रील और मीम्स का मंच नहीं रहा, बल्कि वह व्यवस्था को जगाने वाली अलार्म घड़ी भी बन चुका है। दूसरी, सरकारें अब समझ चुकी हैं कि जनता की जिज्ञासा का इलाज चुप्पी नहीं, बल्कि पारदर्शिता है।
अब सबकी नजरें जांच रिपोर्ट पर हैं। लेकिन इतना तय है कि बिहार में लोकतंत्र अभी पूरी तरह फिट है-यहां सिस्टम भी दौड़ता है, सोशल मीडिया भी दौड़ता है और जनता तो खैर हमेशा से सबसे आगे दौड़ती आई है।
इस पूरे घटनाक्रम पर 'भौकालगुरु' बस इतना ही कह रहे हैं-साहब, बिहार में अब सिर्फ एक्शन नहीं होता, एक्शन के बाद रिएक्शन और फिर इंस्टीट्यूशनल करेक्शन भी फुल स्पीड में होता है!"



