कहते हैं हर अपराधी को सुधरने का एक मौका मिलना चाहिए। हमारे घरों और हलवाइयों की कड़ाही में बैठा 'जला हुआ कुकिंग ऑयल' भी एक ऐसा ही आदतन अपराधी था। वह एक ही कड़ाही में बार-बार गोते लगा-लगाकर, खुद को एल्डिहाइड और ट्रांस-फैट जैसे खतरनाक हथियारों से लैस कर लेता था। उसका एकमात्र मकसद इंसानी दिल, पेट और लिवर पर सर्जिकल स्ट्राइक करना था। जब वहां से उसका मन भर जाता, तो वह चुपके से नालियों या खेतों में कूदकर पर्यावरण और जलीय जीवों की जिंदगी में ज़हर घोल देता था। लेकिन, जरा रुकिए! इस विलेन की जिंदगी में अब एक ट्विस्ट आ गया है। एफएसएसएआई (FSSAI) के कड़े नियमों और कुछ समझदार इंसानों की बदौलत अब इस 'ज़हरीले तेल' का हृदय परिवर्तन हो चुका है।
कड़ाही से सीधे कार के टैंक तक!
आगरा, मथुरा और फिरोजाबाद के दो दर्जन समझदार होटल और नमकीन कारोबारियों ने अब यह जान लिया है कि जो तेल कचौड़ियों को तो क्रिस्पी बना सकता है, लेकिन इंसानी धमनियों को ब्लॉक कर सकता है, उसे अब विदा करने का समय आ गया है। कड़ाही में तीन बार से ज़्यादा तपकर जब इस तेल का 'टोटल पोलर कंपाउंड' 25% तक पहुँच जाता है, तो इसे 'रिटायरमेंट' दे दिया जाता है। पहले जिस जले हुए तेल को लोग बेकार समझकर फेंक देते थे (या गांवों में बेचारे बेज़ुबान पशुओं को चारे में मिलाकर 'हेल्दी डाइट' के नाम पर परोस देते थे), आज उस तेल की 'किडनैपिंग' बड़े सम्मान के साथ की जा रही है।
जयपुर-गुरुग्राम का वीआईपी सफर
अब इस जले-भुने तेल को फेंकने के बजाय बकायदा इकट्ठा किया जा रहा है। इसे किसी बड़े नेता की तरह वीआईपी ट्रीटमेंट देते हुए जयपुर और गुरुग्राम के रीसाइक्लिंग प्लांट्स में भेजा जा रहा है। वहां इसका ऐसा 'ब्रेनवॉश' (यानी रीसाइक्लिंग) किया जा रहा है कि कड़ाही का यह पुराना विलेन, सीधे 'बायो-डीजल' नाम का पर्यावरण-प्रेमी देशभक्त बनकर बाहर निकल रहा है। सोचिए, जो तेल कल तक आपकी सेहत खराब करके डॉक्टर की जेब भर रहा था, आज वह गाड़ियों का इंजन चलाकर देश की तरक्की में 'ईंधन' का काम कर रहा है!
त्योहारों पर 'जले तेल' की चांदी
स्वाति मेहंदीरत्ता और सुनैना गुसाईं जैसी जागरूक टीमें अब वेंडर्स के पास जाकर सरसों, सोयाबीन और पाम ऑयल के बचे हुए हिस्सों को ऐसे सहेज रही हैं, जैसे कोई खजाना ढूंढ रहा हो। हालत यह है कि होली और दिवाली पर, जब लोग अपच और एसिडिटी से परेशान होते हैं, तब ये रीसाइक्लिंग इकाइयाँ 'बचे हुए तेल' के बंपर कलेक्शन का जश्न मना रही होती हैं।
यह व्यंग्य नहीं, एक खूबसूरत हकीकत है। कल तक जिस जले हुए तेल को देखकर डॉक्टर अपना सिर पकड़ लेते थे, आज उसे देखकर पर्यावरण मुस्कुरा रहा है। तो अगली बार जब आप आगरा के पेठे या मथुरा के पेड़े खाएं, तो गर्व से कहिएगा-"हम सिर्फ स्वाद नहीं ले रहे, हम देश के लिए बायो-डीजल का रॉ-मटीरियल तैयार कर रहे हैं!"



