भारतीय समाज में ‘नाराज फूफा’ कोई महज रिश्तेदार नहीं हैं, वे एक संपूर्ण ‘विचारधारा’ हैं। वे एक ऐसा सार्वभौमिक प्राणी हैं, जिनका इकलौता जीवन-उद्देश्य व्यवस्था में उस जगह उंगली रखना है जहाँ से दर्द की हल्की सी सीटी बज सके। शादी का पंडाल हो या देश का संसद भवन, फूफा जी का मिजाज एक ही थर्मामीटर से नापा जाता है - "आखिर इसकी जरूरत क्या थी?"
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सोचिए, अगर किसी शादी में गुलाब जामुन सही तापमान पर हो, पनीर की सब्जी में ग्रेवी गाढ़ी हो और स्वागत में गुलाब की पंखुड़ियाँ भी सही कोण पर गिर रही हों, तो भी फूफा जी को इस बात से गंभीर आपत्ति हो सकती है कि उनकी प्लास्टिक वाली कुर्सी का रुख कूलर की तरफ तीन डिग्री बाईं ओर क्यों नहीं था! यही वह 'क्रिटिकल थिंकिंग' है, जिसे अब भारतीय राजनीति ने आधिकारिक तौर पर अडॉप्ट कर लिया है।
प्रधानमंत्री जी ने जब SRCC के मंच से राजनीतिक विरोधियों की तुलना 'नाराज फूफा' से की, तो दरअसल उन्होंने देश के लाखों परिवारों के उस सबसे पीड़ित वर्ग यानी 'दूल्हे के बाप' के दर्द को राष्ट्रीय मंच दे दिया। बात सच भी है, जब देश में UPI चला, तो फूफा जी ने कहा - "सिक्का देने में जो अपनापन था, वो इस QR कोड में कहाँ?" जब वंदे भारत ट्रेन चली, तो फूफा जी ने चाय की चुस्की लेते हुए बुदबुदाया - "अरे, इतनी जल्दी पहुँचकर करेंगे भी क्या, पुरानी पैसेंजर ही ठीक थी!" और जब नई संसद बनी, तो उन्होंने तुरंत सवाल दाग दिया - "पुरानी वाली में क्या पंखे हवा नहीं दे रहे थे?"
लेकिन सवाल यह है कि फूफा जी आखिर इतने नाराज रहते क्यों हैं?
समाजशास्त्रियों का मानना है कि फूफा जी वास्तव में 'सहानुभूति के भूखे' जीव हैं। वे न तो पूरी तरह 'घर के' होते हैं और न ही 'बाहर के'। वे उस त्रिशंकु की तरह हैं, जिन्हें अगर शादी के कार्ड पर अपना नाम 'विशेष आमंत्रण' में न दिखे, तो वे बारात के दिन तक उपवास पर चले जाते हैं। राजनीति में भी यही हाल है - सत्ता चाहे कुछ भी परोस दे, विपक्ष रूपी फूफा जी का पहला सवाल यही होगा कि "हमसे पूछकर रायता क्यों नहीं फैलाया गया?"
हालाँकि, इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है। अगर शादी में फूफा जी न हों, तो दूल्हे का बाप अपनी औकात से ज्यादा तनावमुक्त दिखने लगता है, जो कि हमारी संस्कृति के खिलाफ है! उसी तरह, लोकतंत्र में अगर कोई 'फूफा' बनकर हर व्यवस्था पर उंगली न उठाए, तो सरकारें यह मान बैठेंगी कि हलवाई ने गाजर का हलवा वाकई बहुत अच्छा बनाया है - भले ही उसमें चीनी की जगह नमक गिर गया हो।
खैर, राजनीति अपनी जगह चलती रहेगी, चुनाव आते-जाते रहेंगे, लेकिन भारतीय शादियों की अमर परंपरा में 'नाराज फूफा' का पद सुरक्षित रहेगा। वे कोने वाली सोफे पर बैठेंगे, प्लेट में थोड़ा सा सलाद छोड़ेंगे, और जाते-जाते दूल्हे के कान में धीरे से फूँक मारेंगे - "सब तो ठीक था बेटा, पर गाड़ियों की पार्किंग थोड़ी दूर नहीं थी?"
और बस, इसी एक वाक्य के साथ फूफा जी का जीवन सफल हो जाता है!



