जैसे ही कैलेंडर में जून-जुलाई का पन्ना पलटता है, हमारे देश के आधुनिक महानगरों, मसलन गुरुग्राम की आत्मा अचानक जाग उठती है। जिन शहरों को हम कल तक 'मिलेनियम सिटी' या 'ग्लोबल हब' कहकर गर्व से सीना चौड़ा कर रहे थे, वे मानसून की पहली ही बौछार में पलक झपकते ही यूरोप के 'वेनिस' शहर में तब्दील हो जाते हैं। बस फर्क सिर्फ इतना है कि वेनिस में लोग शौक से नाव चलाते हैं, और हमारे यहाँ लोग मजबूरी में अपनी चमचमाती गाड़ियों को पनडुब्बी बनते देखते हैं। करोड़ों का रोड टैक्स देने वाले नागरिकों को अब समझ आ गया है कि इस मौसम में सिडैन या एसयूवी (SUV) की चाभी ढूंढना पुरानी बात हो चुकी है; असली समझदारी तो कार की डिक्की में हवा भरी हुई ट्यूब और एक जोड़ी पतवार रखने में है, ताकि जब शहर 'देसी वेनिस' बने, तो आप शान से चप्पू चलाते हुए दफ्तर पहुँच सकें।
कंक्रीट का समंदर और 'वाटर-व्यू' फ्लैट्स
हमारे दूरदर्शी टाउन प्लानर्स और बिल्डरों की दाद देनी पड़ेगी, जिन्होंने 'लुक ईस्ट' और 'लुक वेस्ट' की तर्ज पर 'लुक वॉटर' पॉलिसी अपनाई है। शहर के जिन हिस्सों में पहले प्राकृतिक नाले, तालाब और खुली जमीन हुआ करती थी, वहाँ अब चमचमाती गगनचुंबी इमारतें खड़ी हैं। इन सोसाइटियों को बेचते वक्त बिल्डरों ने शायद खरीदारों से 'सी-फेसिंग' (समुद्र के सामने) फ्लैट्स का वादा किया था। अब समुद्र तो इतनी जल्दी गुड़गांव आ नहीं सकता, इसलिए उन्होंने मानसून में पूरी सड़क को ही समंदर बनाकर करोड़ों के फ्लैट खरीदने वाले ग्राहकों को 'वाटर-व्यू' का लाइव और मुफ्त अनुभव दे दिया है। इसे कहते हैं मास्टर प्लानिंग और दूरदर्शी सोच!
'वर्क फ्रॉम होम' या 'तैरकर जाओ होम'?
जैसे ही आसमान में काले बादल घिरते हैं, प्रशासन का सबसे पसंदीदा, आधुनिक और अचूक हथियार एक्टिवेट हो जाता है—"वर्क फ्रॉम होम (WFH) की सलाह"। जब सड़कें तालाब बन जाएं, सीवरेज लाइनें उल्टी गंगा बहाने लगें और गाड़ियाँ पानी में तैरने लगें, तो नगर निगम बड़ी मासूमियत से एडवाइजरी जारी कर कहता है, "कृपया घरों में रहें।" यह मशवरा बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई डॉक्टर गंभीर मरीज से कहे, "अस्पताल का बेड और इलाज तो हमसे न हो पाएगा, आप एक काम कीजिए, बीमार पड़ना ही बंद कर दीजिए।" जनता भी धन्य है, जो भारी-भरकम टैक्स चुकाने के बाद ऑफिस जाने के लिए नई कार की जगह अच्छे ब्रांड की 'लाइफ जैकेट' शॉर्टलिस्ट करने लगती है।
आपदा में अवसर: तैरते हुए ऑफिस और एडवेंचर स्पोर्ट्स
वैसे तो सरकारें हर साल करोड़ों का बजट 'ड्रेनेज सफाई' और 'मानसून पूर्व तैयारियों' के नाम पर डकार जाती हैं, लेकिन हमें इस आपदा में भी सकारात्मक सोचना चाहिए। यह जलभराव दरअसल कोई समस्या नहीं, बल्कि प्रशासन द्वारा कॉर्पोरेट कर्मचारियों को मुफ्त में दिया जाने वाला 'एडवेंचर स्पोर्ट्स' और 'टीम बिल्डिंग' का शानदार मौका है। जलमग्न सड़कों पर रेंगते हुए घंटों फंसे रहना हमें 'अपार धैर्य' सिखाता है, और घुटने भर पानी के बीच से लैपटॉप बैग बचाकर ऑफिस पहुँचना 'कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने' (Survival Skills) की बेहतरीन कॉर्पोरेट ट्रेनिंग देता है।
कागजी मास्टर प्लान और चप्पू का सहारा
टाउन प्लानिंग के विशेषज्ञ टीवी और अखबारों में चिल्लाते रह जाते हैं कि "साहब, ड्रेनेज सिस्टम ठीक करो, प्राकृतिक जल निकायों को मत छेड़ो, मास्टर प्लान के हिसाब से विकास करो।" लेकिन प्रशासन का अपना एक अलग, स्वदेशी मास्टर प्लान है। उनका प्लान बेहद सरल और सटीक है—"बारिश आएगी, पानी भरेगा, हम 'वर्क फ्रॉम होम' की एडवाइजरी जारी करेंगे, फिर धूप खिलेगी, पानी खुद-ब-खुद सूखेगा और ड्रेनेज का पूरा मामला अगले साल के मानसून तक के लिए रफा-दफा हो जाएगा!"
भौकालगुरु बारिश में भीगने के बाद छींकते हुये कह रहे कि, दिल्ली-एनसीआर और खासकर गुरुग्राम के नागरिकों को बस यही सलाह है कि मानसून के इस मौसम में मौसम विभाग की चेतावनियों को हल्के में न लें। अपनी गाड़ियों की डिक्की में चमचमाते छाते के साथ-साथ एक मजबूत पतवार और हवा ट्यूब हमेशा तैयार रखें। इसके साथ ही, भगवान से यह प्रार्थना भी करते रहें कि अगली बार जब वे ईमानदारी से शहर का टैक्स भरें, तो सरकार उन्हें बदले में चलने के लिए कंक्रीट की सूखी सड़क दे, न कि जबरन अलॉट किया गया एक विशाल पब्लिक स्विमिंग पूल।



