लीजिए साहब, देश का एक नया सस्पेंस थ्रिलर टीवी स्क्रीन पर मुफ्त चल रहा है—“यह इलायची है या कुछ और?”
कहानी में बॉलीवुड के तीन बड़े सितारे हैं, जो फिल्मों में गुंडों को एक मुक्के में उड़ा देते हैं और विज्ञापन में एक पैकेट हाथ में लेकर कहते हैं-“बोलो ज़ुबां केसरी!”
अब महाराष्ट्र FDA ने भी पूछ लिया-“भाई साहब, बेच तो आप इलायची रहे हैं, लेकिन याद किसकी दिला रहे हैं?”
यहीं से एंट्री होती है सरोगेट एडवरटाइजिंग की। यानी सामने उत्पाद कुछ और, लेकिन ब्रांड पहचान से इशारा किसी दूसरे उत्पाद की तरफ!
फॉर्मूला आसान है-जिस चीज का सीधा विज्ञापन नहीं कर सकते, उसी नाम और पहचान से कोई दूसरा उत्पाद दिखा दीजिए। टीवी पर इलायची दिखाई जाएगी, लेकिन दर्शक के दिमाग में ब्रांड की पुरानी पहचान घूमती रहेगी।
और अगर विज्ञापन पर जुर्माना लग गया तो? करोड़ों की फीस लेने वाले सितारों के लिए शायद यह भी कॉन्ट्रैक्ट की एक छोटी-सी लाइन हो-“जुर्माना हुआ तो कंपनी देख लेगी!”
आखिर सवाल यही है-विज्ञापन में क्या दिखाया गया, यह महत्वपूर्ण है या दर्शक के दिमाग में क्या पहुंचा?
अब देखना है कि FDA के नोटिस का जवाब क्या आता है। शायद-“हुजूर, हम तो सिर्फ इलायची की खुशबू फैला रहे थे!”



