भारतीय राजनीति में इन दिनों 'शब्दों के तीर' खत्म हो चुके हैं, इसलिए नेताओं ने अब सीधे 'दिवंगत पूर्वजों' पर मिसाइलें दागनी शुरू कर दी हैं। ताजा मामला कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे जी के उस बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने पीएम मोदी के दिवंगत पिता पर कुछ ऐसा कह दिया कि बीजेपी वाले ऐसे भड़क उठे जैसे उन्होंने किसी के घर में बिना इन्विटेशन के चाय पी ली हो!
नतीजा यह हुआ कि पटना से लेकर लखनऊ तक बीजेपी कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर ऐसा जोरदार प्रदर्शन किया कि भगवान भी ऊपर से सोच रहे होंगे - "अरे भाई, धरती पर चुनाव खत्म हो गए हैं या अभी भी बाकी हैं?"
जब मंच पर छिड़ी 'डिबेट' और निकल पड़ी भावनाएं
घटना बिहार में डॉ. कृष्ण सिंह की जयंती के दौरान की है। खड़गे साहब भाषण दे रहे थे कि बीच में जनता से किसी ने टोक दिया - "मोदी जी कहीं नहीं जाने वाले!" अब खड़गे साहब को गुस्सा आना लाजमी था। उन्होंने तुरंत माइक संभाला और ऐसा ताना मारा कि बीजेपी नेताओं के कान खड़े हो गए। आरोप है कि इस दौरान प्रधानमंत्री के दिवंगत पिता तक बात पहुंच गई।
यहाँ समझने वाली बात यह है कि हमारे देश के राजनेता जब जिंदा नेताओं से लड़ते-लड़ते थक जाते हैं, तो वे इतिहास के पन्नों को खंगालकर ऐसे 'दिवंगत पॉइंट्स' ढूंढ निकालते हैं, जिन पर कोई क्रॉस-क्वेश्चन न कर सके। आखिरकार, भूतकाल से बहस करने का मजा ही कुछ और है!
बीजेपी का विरोध: "पिता का अपमान, देश का महासंग्राम!"
बीजेपी अध्यक्ष संजय सरावगी और सांसद मनोज तिवारी ने इस बयान पर ऐसा मोर्चा खोला मानो देश की जीडीपी सीधे इसी बयान पर टिकी हो। मनोज तिवारी जी ने तल्ख तेवर दिखाते हुए कहा कि "बिहार के लोग अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं, और यहाँ आकर ऐसी बातें बर्दाश्त नहीं की जाएंगी!"
बिल्कुल सही बात है! हमारे देश में राजनीति चाहे जितनी गंदी हो जाए, लेकिन जैसे ही किसी नेता के परिवार या माता-पिता पर बात आती है, सारे दल तुरंत 'नैतिकता और संस्कृति' के चोले पहनकर सड़कों पर उतर आते हैं। ऐसा लगता है जैसे इससे पहले राजनीति में सब लोग एक-दूसरे को 'प्रिय बंधु' कहकर ही संबोधित करते थे!
कांग्रेस का काउंटर: "जब हम पर वार, तो हम चुप क्यों रहें?"
उधर, कांग्रेस के सांसद इमरान मसूद मैदान में उतरे और खड़गे जी की ढाल बनकर खड़े हो गए। उन्होंने बड़े पते की बात कही - "जब बीजेपी वाले हमारे नेताओं के माता-पिता या खानदान पर बोलते हैं, तब इनकी नैतिकता कहाँ जाती है? अब हम चुप नहीं बैठेंगे, ईंट का जवाब पत्थर से देंगे!"
वाह! राजनीति का यह 'न्यूटन का तीसरा नियम' वाकई गजब का है - हर क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है, बस फर्क इतना है कि यहाँ प्रतिक्रिया में सिर्फ गालियां और धरने-प्रदर्शन होते हैं! कांग्रेस कह रही है कि हम भी उसी भाषा में जवाब देंगे। यानी आने वाले दिनों में लोकसभा और रैलियों में शब्द-कोश के सबसे भारी और कड़वे शब्दों की भारी डिस्काउंट सेल लगने वाली है।
जनता के हाथ में पॉपकॉर्न और सिर पर महंगाई!
इस पूरी जुबानी जंग और देशव्यापी प्रदर्शन का सार बस इतना है कि:
- सत्ता पक्ष को एक नया मुद्दा मिल गया है, जिससे वह महंगाई, बेरोजगारी और गड्ढेदार सड़कों जैसे छोटे-मोटे मुद्दों से जनता का ध्यान भटका सके।
- विपक्ष को यह साबित करने का मौका मिल गया है कि देखो, वे भी हमें कम नहीं समझते!
और बेचारी जनता? वह सड़क के किनारे खड़ी होकर यह सब तमाशा देख रही है और सोच रही है कि काश! नेताओं के पास ज़मीन के विकास के लिए भी उतनी ही ऊर्जा होती, जितनी एक-दूसरे के पूर्वजों पर बयानबाजी करने के लिए होती है!



