भौकालगुरु

अगर स्पाइडर-मैन भारत आ गया तो...!

अगर स्पाइडर-मैन भारत आता तो शायद दीवारों से ज्यादा ट्रैफिक, गड्ढों और नागरिक समस्याओं से लड़ता। एक हल्का-फुल्का व्यंग्य, जो सुपरहीरो के जरिए जिम्मेदार नागरिक बनने का संदेश देता है।

अगर स्पाइडर-मैन भारत आ गया तो...!

कल्पना कीजिए... एक सुबह दिल्ली मेट्रो स्टेशन पर अचानक लाल-नीले सूट में स्पाइडर-मैन उतरता है। लोग पहले सेल्फी लेते हैं, फिर पूछते हैं, "भाई, नई वेब सीरीज़ की शूटिंग चल रही है क्या?"

स्पाइडर-मैन चुपचाप मेट्रो की लाइन में लग जाता है। कोई वीआईपी एंट्री नहीं, कोई सुपरहीरो वाला रौब नहीं। पीछे से एक अंकल बोलते हैं, "बेटा, पहले टोकन ले लो... यहां जाला फेंकने से काम नहीं चलता!"

फिर वह ट्रैफिक सिग्नल पर पहुंचता है। लाल बत्ती होते ही मकड़ी के जाले जैसी आकृति बनाकर लोगों को रुकने का इशारा करता है और हरी बत्ती पर हाथ हिलाकर कहता है, "अब जाइए... लेकिन हेलमेट पहनकर!" बुजुर्गों को सड़क पार कराता है, एम्बुलेंस के लिए रास्ता खाली करवाता है और बीच-बीच में ट्रैफिक पुलिस की भी मदद कर देता है।

उधर सोशल मीडिया पर नया ट्रेंड शुरू हो जाता है—#SpiderManInMyCity। कोई कहता है, "स्पाइडर-मैन, हमारे शहर के गड्ढे भर दो।" कोई कहता है, "पहले पानी की समस्या सुलझा दो।" गुरुग्राम वाले तो सीधे बोल देते हैं—"भाई, एक दिन हमारे साथ भी चलो..."

दोपहर में सुपरहीरो किसी फाइव-स्टार होटल में नहीं, बल्कि ठेले पर खड़े होकर समोसा खाता और कुल्हड़ वाली चाय पीता नजर आता है। तभी कोई पूछ बैठता है, "भैया, जाला छोड़ो... यूपीआई करोगे या कैश?"

शाम होते-होते स्पाइडर-मैन किसी फिल्म का नहीं, बल्कि ब्लड डोनेशन कैंप का पोस्टर बॉय बन जाता है। संदेश देता है-"किसी की जिंदगी के स्पाइडर-मैन बनिए।" फिर एम्बुलेंस को रास्ता दिलवाने के लिए ट्रैफिक में दौड़ पड़ता है।

आखिर में शहर के लोग समझ जाते हैं कि असली सुपरपावर दीवारों पर चढ़ने में नहीं, बल्कि अपने शहर की जिम्मेदारी निभाने में है। शायद इसी वजह से भारत में स्पाइडर-मैन का सबसे बड़ा डायलॉग होता -

"With Great Power Comes Great Responsibility... और थोड़ा-सा Civic Sense भी!"