वैज्ञानिकों ने फिर से अरबों डॉलर हवा में (माफ़ कीजिएगा, निर्वात में) उड़ा दिए हैं। NASA ने 'नैन्सी ग्रेस रोमन स्पेस टेलीस्कोप' को अंतरिक्ष में रवाना किया है। यह महाशय 16 लाख किलोमीटर दूर लैग्रेंज प्वाइंट-2 (L2) पर जाकर बैठेंगे- यानी पृथ्वी के तमाम ट्रैफिक, प्रदूषण और रिश्तेदारों के तानों से इतनी दूर, जहाँ कोई उन्हें ढूँढ भी न सके।
डार्क मैटर की खोज, पर अपने 'डार्क फ्यूचर' का क्या?
टेलीस्कोप का काम है 'डार्क एनर्जी' और 'डार्क मैटर' को खोजना। अब वैज्ञानिकों को कौन समझाए कि डार्क मैटर समझने के लिए 16 लाख किलोमीटर दूर जाने की क्या ज़रूरत थी? थोड़ा रुककर सोमवार की सुबह आम इंसान के दिमाग में झाँक लेते, तो 'अंधेरा और उलझन' वहीं समझ आ जाती। पर नहीं, हमें तो ब्रह्मांड के फैलने की वजह जाननी है, भले ही यहाँ शहरों की सड़कें सिकुड़ती जा रही हों!
हबल से 100 गुना बड़ा चश्मा और 1.4 TB का 'हाई-स्पीड डेटा'
दावा है कि इसका कैमरा हबल से 100 गुना बड़ा क्षेत्र देखेगा और रोज़ 1.4 टेराबाइट डेटा भेजेगा। यानी अब ब्रह्मांड की HD तस्वीरें इतनी जल्दी आएँगी कि वैज्ञानिकों के फोन की मेमोरी भी 'Storage Full' दिखाने लगेगी। अब पृथ्वी पर मौजूद एआई और मशीन लर्निंग मिलकर यह तय करेंगे कि इतनी दूर जो धुंधला सा टिमटिमाते हुए 'डॉट' दिख रहा है, वह नया ग्रह है या फिर कैमरे के लेंस पर जमा हुआ कोई एलियन मच्छर!
तीन महीने की शांति, फिर 2027 में 'फ़ोटोशूट'
टेलीस्कोप को अपनी जगह पहुँचने में 3 महीने लगेंगे, और पहली तस्वीर 2027 में आएगी। यानी अंतरिक्ष में भी सरकारी दफ्तरों जैसी 'फाइल मूव' होने की रफ़्तार है। 5 से 10 साल तक चलने वाले इस मिशन का असली मकसद हज़ारों नए ग्रह खोजना है, शायद इसलिए ताकि जब हम इस धरती का कचरा पूरी तरह साफ न कर पाएँ, तो रहने के लिए कोई नया विकल्प तैयार रहे!
खैर, रोमन टेलीस्कोप अब L2 पर बैठकर दूर-दराज़ के तारों को घूरेगा। देखना बस यह है कि 16 लाख किलोमीटर दूर जाकर ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्य सुलझते हैं या वैज्ञानिक आखिर में यही निष्कर्ष निकालते हैं कि - "ब्रह्मांड बहुत बड़ा है, और हम अभी भी अकेले ही बोर हो रहे हैं।"
