कभी संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता था। अब लगता है, यह धीरे-धीरे थिएटर बनती जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां टिकट जनता खरीदती है और शो सांसद करते हैं।
इस बार मंच पर कहानी थी "चंदा चोरी" की। एक सांसद पुजारी बने, दूसरे ने श्रद्धालु बनकर दान दिया, फिर पुजारी दान लेकर भागे और बाकी कलाकारों ने उन्हें पकड़ लिया। पूरा दृश्य देखकर लगा कि संसद का अगला सत्र शायद "इंडियाज़ गॉट टैलेंट – सांसद स्पेशल" के नाम से होना चाहिए।
सवाल यह नहीं कि विरोध क्यों हुआ। लोकतंत्र में विरोध जरूरी है। सवाल यह है कि क्या अब हर मुद्दे का समाधान नाटक, पोस्टर, मुखौटे और वेशभूषा से ही निकलेगा?
देश में बेरोजगारी, महंगाई, सीमा सुरक्षा, किसानों की समस्याएं और शिक्षा जैसे मुद्दे अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन संसद में इन दिनों अभिनय ज्यादा और बहस कम दिखाई देती है। ऐसा लगता है कि सांसद अब भाषण से ज्यादा अपने किरदार की तैयारी में व्यस्त हैं।
हो सकता है आने वाले दिनों में कोई सांसद डॉक्टर बनकर इलाज करता दिखे, कोई जज बनकर फैसला सुनाए और कोई क्रिकेट अंपायर बनकर विपक्ष या सत्ता पक्ष को "आउट" दे दे। फिर संसद और रियलिटी शो में फर्क करना मुश्किल हो जाएगा।
जनता ने सांसदों को अभिनय के लिए नहीं, अपनी आवाज उठाने के लिए चुना है। कैमरे के सामने कुछ मिनट की सुर्खियां मिल सकती हैं, लेकिन समस्याओं का समाधान केवल गंभीर चर्चा और ठोस फैसलों से ही होगा।
फिलहाल संसद का नया ट्रेंड यही है - जहां बहस कम, प्रदर्शन ज्यादा और संवाद की जगह दृश्य प्रभाव ज्यादा नजर आता है। आखिर लोकतंत्र भी अब शायद 'वायरल कंटेंट' के दौर में प्रवेश कर चुका है।
