कभी क्रिकेट में एक बल्लेबाज़ होता था, जो पहली 30 गेंदों में सिर्फ 8 रन बनाता था, लेकिन ड्रेसिंग रूम में किसी की धड़कन नहीं बढ़ती थी। क्योंकि सब जानते थे- ये अजिंक्य रहाणे हैं, जल्दी नहीं, सही खेलेंगे।
आज के दौर में जहां टी20 की पहली गेंद से छक्का नहीं लगा तो सोशल मीडिया पर "रिटायर हो जाओ" ट्रेंड होने लगता है, वहां रहाणे जैसे खिलाड़ी शायद गलत समय में पैदा हो गए थे।
उन्होंने भी आखिरकार रिटायरमेंट ले लिया। अब क्रिकेट में धैर्य, तकनीक और शांत चेहरे की एक पूरी प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर है।
रहाणे उन खिलाड़ियों में थे, जिनका बल्ला कम और उनका स्वभाव ज्यादा बोलता था। सेंचुरी बनाने के बाद भी ऐसा जश्न मनाते थे जैसे मोहल्ले की किराना दुकान से दूध लेकर लौटे हों।
2020-21 के ऑस्ट्रेलिया दौरे में जब पूरी टीम चोटिल थी, कप्तान वापस लौट चुके थे और सामने ऑस्ट्रेलिया था, तब रहाणे ने बिना शोर किए इतिहास लिख दिया। लेकिन अफसोस, उस समय इंस्टाग्राम रील्स इतनी लोकप्रिय नहीं थीं, वरना शायद लोग उनकी कप्तानी को भी "ट्रेंड" कर देते।
आज क्रिकेट में स्ट्राइक रेट की चर्चा ज्यादा होती है, स्ट्रेट ड्राइव की कम। शांत दिमाग की कीमत कम हो गई है और आक्रामक बॉडी लैंग्वेज ही नेतृत्व का नया पैमाना बन चुकी है।
रहाणे का संन्यास सिर्फ एक खिलाड़ी का जाना नहीं है, बल्कि उस दौर का विदा होना है, जब खिलाड़ी ट्रोल्स से नहीं, गेंदबाजों से लड़ते थे।
अलविदा रहाणे... आपने साबित किया कि हर कहानी शोर मचाकर नहीं, कुछ कहानियां खामोशी से भी इतिहास बन जाती हैं।
