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ट्रम्प की सनक का 'रियलिटी शो' और ग्लोबल ऑडियंस का 'ब्लड प्रेशर'!

अमेरिका-ईरान जंग खत्म हुई, लेकिन मिडिल ईस्ट में शांति अभी दूर है। होरमुज, तेल संकट, इजरायल और परमाणु कार्यक्रम नई चुनौतियां बनकर सामने हैं।

ट्रम्प की सनक का 'रियलिटी शो' और ग्लोबल ऑडियंस का 'ब्लड प्रेशर'!

दुनिया में सनक दो तरह की होती है। एक वह जो न्यूटन बाबू को आई और सेब गिरते ही ग्रेविटी खोज डाली। दूसरी वह, जो वाशिंगटन के व्हाइट हाउस से चलती है और ट्विटर (अब X) के एक नोटिफिकेशन से पूरी दुनिया का भूगोल और शेयर मार्केट दोनों हिला देती है। हम बात कर रहे हैं ग्लोबल पॉलिटिक्स के इकलौते 'डायरेक्टर-कम-एक्टर' डोनाल्ड ट्रम्प की, जिनकी सनक की आंच में आज पूरा विश्व तंदूरी चिकन की तरह झुलस रहा है। दुनिया का हर देश सुबह उठकर सबसे पहले चाय नहीं पीता, बल्कि यह देखता है कि आज ट्रम्प चाचा ने नाश्ते में किस देश पर कितना टैरिफ थोपा है या किसे 'ट्विटर-धमकी' दी है!

अभी हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच पूरे 107 दिन चली 'इश्क और जंग' की वेब सीरीज का सीजन-1 खत्म हुआ है। खबर आई है कि आगामी 19 जून को एक भव्य शांति समझौते पर मुहर लग जाएगी। ताली बजाइए साहेब! 60 दिन के सीजफायर का ऐलान हुआ है। लेकिन मिडिल ईस्ट का इतिहास गवाह है कि यहाँ शांति उतनी ही अस्थायी होती है, जितनी नए साल पर ली गई 'जिम जाने की कसम'। यहाँ एक छोटी सी चूक भी सीधे तीसरे विश्वयुद्ध का इनविटेशन कार्ड बन जाती है।

अब इस सीजफायर को जमीन पर लागू रखना अपने आप में एक 'मिशन इम्पॉसिबल' है। ट्रम्प साहब दुनिया में शांति का ठेका तो ले आए, लेकिन अपने सबसे परम मित्र इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को वॉट्सऐप ग्रुप में एड करना भूल गए। नेतन्याहू साहब पहले ही हाथ खड़े कर चुके हैं कि "हम इस रील्स (Deal) का हिस्सा नहीं हैं।" अब सोचिए, अगर लेबनान में इजरायल ने जरा सी भी 'उंगली' की, तो ईरान इसे सीजफायर का उल्लंघन मानकर रॉकेट दाग देगा। फिर क्या? ट्रम्प साहब फिर से टीवी पर आकर कहेंगे, "मैंने तो कहा था, पर कोई मेरी सुनता ही नहीं!"

दूसरी मजेदार चुनौती है 'होरमुज जलडमरूमध्य', यानी दुनिया के तेल का वो नल, जहाँ से 20 परसेंट कच्चा तेल गुजरता है। जंग के चक्कर में इस नल पर ऐसा ताला लगा कि भारत से लेकर अमेरिका तक आम आदमी की जेब में 'पेट्रोल-डीजल' के नाम पर डकैती डल गई। अब डील हो गई है, तो उम्मीद है कि तेल बहेगा। लेकिन एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि हुजूर, समुद्र में इतनी बारूदी सुरंगें बिछी हैं कि उन्हें ढूंढकर निकालने में ही महीनों लग जाएंगे। यानी, तेल संकट अभी टला नहीं है, बस वह 'वेटिंग लिस्ट' में है। आम आदमी स्कूटर में तेल डलवाने से पहले अब भी भगवान को याद कर रहा है।

तीसरी और सबसे सस्पेंस वाली चुनौती है ईरान का परमाणु कार्यक्रम। अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम का हलवा बनाना बंद करे, और ईरान कहता है कि "यह तो हमारा संप्रभु अधिकार है, हम तो दिवाली के पटाखे बना रहे हैं।" इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने परमाणु वार्ता की मेज पर बैठे-बैठे ही ईरान पर मिसाइलें दाग दी थीं। अब सवाल यह है कि क्या इस बार ट्रम्प साहब अपने वादे पर टिके रहेंगे? या फिर अपनी पुरानी आदत के मुताबिक-पहले गले मिलेंगे, फिर फोटो खिंचवाएंगे, और घर जाते ही ईरान पर 'महा-प्रतिबंध' का हथौड़ा चला देंगे?

देखा जाए तो ट्रम्प की राजनीति किसी हॉलीवुड फिल्म या बिग बॉस के घर जैसी है। स्क्रिप्ट बहुत सिंपल है: पहले खुद ही भयंकर तनाव पैदा करो, जब सब डर जाएं तो बीच में 'मसीहा' बनकर कूदो, और अंत में खुद को नोबेल शांति पुरस्कार का इकलौता हकदार घोषित कर दो! लेकिन उन्हें कौन समझाए कि मिडिल ईस्ट कोई टीवी स्टूडियो नहीं है, जहाँ रीटेक मिल जाएगा। यहाँ का एक गलत फैसला सीधे श्मशान घाट का रास्ता खोलता है।

दुनिया फिलहाल राहत की सांस तो ले रही है, लेकिन डॉक्टरों ने मना किया है कि ज्यादा गहरी सांस मत लो, क्योंकि ट्रम्प का मूड कब बदल जाए, इसका अंदाजा शायद खुद उनके हेयर स्टाइलिस्ट को भी नहीं होता। जब दुनिया की परमाणु चाबियां और वैश्विक शांति किसी एक नेता के सुबह के 'मूड और ट्वीट' पर निर्भर होने लगे, तो समझ लीजिए कि सनक अब सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी कायनात की सामूहिक समस्या बन चुकी है।

इधर अपने 'भौकालगुरु' भी भयंकर संकट में हैं! वे आजकल अपना मानसिक संतुलन मेंटेन करने के लिए सुबह-शाम बाबा रामदेव का कपालभाति और अनुलोम-विलोम कर रहे हैं। उन्हें डर है कि कब ट्रम्प साहब अपने बयान से पलटी मार दें, कब शांति की जगह क्रांति का ट्वीट दाग दें और कब पूरा विश्व फिर से 'कन्फ्यूज' होकर योगासन की मुद्रा में आ जाए!